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Re: “घाव ” बना नासूर आओ 'होली' जल्दी आओ -जियरा जरा ज

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Originally Posted by shuklabhramar5 View Post
[size="6"]आओ 'होली' जल्दी आओ - जियरा जरा जुड़ाई-
“holi contest”

होली आई मेरे भाई बन - ठन के

रंगीली जैसे नारि हो .....
पिया के स्वागत तत्पर बैठी
छप्पन भोग बनाये
गुल - गुलाल हर फूल बटोरे
छन - छन सेज संवारे
[font=mangal] घूंघट[ /font] उठा उठा केताके
घर आँगन क्षन - क्षन में भागे
हवा बसंती - कोंपल- हरियाली
तन में आग लगाये
खिले हुए हर फूल वो सारे
मुस्काएं - बहुत - चिढ़ाएं
कोयल भी अब कूक- कूक कर
" कारी " - करती जाये
सुबह ' बंडेरी ' - ' कागा' बोले
' नथुनी ' हिल -हिल जाये
होंठों को फिर चूमि - चूमि के
दिल में आग लगाये
कहे सजन चल पड़े तिहारे
जागे - गोरी ' भाग ' रे
आँगन तुलसी खिल - खिल जाये
हरियाली ' पोर ' - ' पोर ' में छाये
रंग - बिरंगी तितली जैसी
भौंरो को ललचाये
रंग गुलाल से डर- डर मनवा
छुई - मुई हो जाये
पवन सरीखी - पुरवाई सी
गोरी उड़ - उड़ जाये
चूड़ी छनक - छनक ' रंगीली '-
होली याद दिलाये
सराबोर कब मनवा होगा
मोर सरीखा नाचे
पपीहा - पिया - पिया तडपाये
बदरा उडि - उडि गए " कारगिल "
" काश्मीर "-" लद्दाख "
गोरिया विरहा -" रैना " मारी
भटके कोई सागर तीरे
कोई कन्या - कुमारी
बंडवा - नल -' सुख' -' सोख ' ले रहा
फूल रहा - कुम्हिलाई
आओ ' होली ' जल्दी आओ
कान्हा को लई आओ
सावन के बदरा [font=mangal] से[ /font] बरसो
जियरा जरा जुडाई

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रम र
३०..२०११
[/size]

'लाल' नहीं पाया ना 'प्याला'


( photo with thanks from google/net)
मधुशाला में मधु है उसकी
चोली दामन साथ निभाती
दिल की हाल बयाँ करते हैं
चार यार संग बन बाराती
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कभी हँसे 'कद' रोया करदे
नाच झूम मन की सब कह्दे
दर्द-दवा-है वैद्य वहीं सब
अपनी कहदे उनदी सुनदे
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एक 'कमाई'- बेंच के लाता
चार मौज मस्ती रत रहते
कहीं कोई खाली जो आता
कभी धुनाई गिर पड़ खाता
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एक-एक पैग जो अंदर जाते
भाव भरे हर व्यथा सुनाते
सच्चा इंसा हूँ मै यारों
'पागल' दुनिया घर फिर आते
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बात-बात में बने बतंगड़
धक्का-मुक्की दिन या रात
कभी ईंट तो मारें कंकड़
गली मोहल्ला ज्यों बारात
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'छज्जू' के हैं छह-छह कुड़ियां
दिखती सारी प्यारी गुड़िया
जाने कौन कर्म ले आयीं
प्रेम में रत या जहर की पुड़िया ?
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'कुछ' कहती ये बड़ा शराबी
'पी' लेता तो बड़ी खराबी
'लाल' नहीं पाया ना 'प्याला'
समझो ना फिर -इसको घरवाला
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बद अच्छा बदनाम बुरा है
किया हुआ हर काम बुरा है
'सच्चाई ' दबती फिर जाती
गली मोहल्ले 'वही' शराबी ....
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दुश्मन पागल, आवारा सा चीखे
लट्ठ लिए पागल सा घूमे
कभी किसी की चोटी खींचे
मार के रोता आँखें मींचे
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मै ना कोई शराबी यारा
'बदचलनी ' के गम का मारा
भटकी बीबी कुड़ियां जातीं
नाक है कटती शर्म है आती
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'यार' बड़े उनके हैं सारे
आँख दिखा मुझको धमकाते
रोता दिल 'नासूर' अंग है
काट सकूं ना -ना-पसंद हैं
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माँ की सहमति से बालाएं
सजधज मेकअप जाएँ-आयें
'पप्पा' को मिटटी बुत समझें
चैटिंग पूरा दिवस बिताएं
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उस दिन पुलिस बुलायी थी तू
बैठक दंड कराये खुश थी
आज बनाऊंगा मै मुर्गी
याद रखेगी जीवन भर तू
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'छज्जू' बोला आज हे मुई
मर जाऊंगा 'धर' तारां ( बिजली) मै
रोज-रोज मरता है क्यों भय
मर जा -जा मर तंग मै हुयी
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लिए लट्ठ छत के ऊपर वो
गया थामने 'बिजली' दामन
चीख पुकार शोर रोना 'हुण'
लाठी ईंटों की फिर वो धुन
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पापा ! मम्मी ! , रोती कुड़ियां
सच्ची-प्यारी- मार भी खाईं
हंसी व्यस्त कुछ कथा सुनाती
मै सच्ची हूँ , अजब ये दुनिया ....
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हुआ इकठ्ठा रात मोहल्ला
'गबरू' कुछ फिर चढ़े बढे घर
'छज्जू' भागा कूद-फांदकर
कान पड़ी जब पुलिस-पुलिस तब
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कौन है सच्चा कौन है झूठा ?
दया रहम दोनों पर आती
'रोजगार' ना कभी 'गरीबी'
'इन्हे' इसी मन्जिल पहुंचाती
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'सपनों' में जीने की खातिर
कभी दिखावा -'पेट' की खातिर
लता-बेल 'कांटे' चढ़ जातीं
या दल-दल में फंसती जातीं
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पति-पत्नी का कैसा रिश्ता ??
मिले 'लाल' ही है मन मिलता
तन-मन प्रेम सभी का हिस्सा
नहीं प्रेम कल का बस किस्सा
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अपराधी हैं ताक में रहते
बिगड़े सब, 'कुछ' तो बिक जाए
कौड़ी भाव में 'स्वर्ण' मिले तो
निज दूकान तो सजती जाए
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दोस्त शराबी के फिर आते
'साहस' दे गृह फिर दे जाते
'माँ' कहती हे! पास पडोसी
ना जाओ ना फिर 'वे' आते
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बुलबुल कहाँ कैद रह पाएं
खोलो पिजड़ा फिर -फिर आयें
रहें कहाँ ना साथी पाएं
निज करनी हैं पर कतराए
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'रब' हे ! ऐसे दिन ना लाओ
शांति रहे, मन -मंदिर सुन्दर
प्रेम-पूज्य मूरति सीता-शुभ
राम 'परीक्षा-अग्नि' न भाओ
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सत्कर्मों से मिला सुघड़ तन
नरक वास हे! क्यों मन लाते
मनुज प्रेम 'मानव' निज तन कर
मृग मरीचिका क्यों भरमाते ??
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( एक आँखों देखी सच्ची व्यथा कथा पर आधारित, प्रयुक्त सभी नाम काल्पनिक हैं और किसी के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं हैं , कुछ शब्द पंजाबी के प्रयुक्त हैं )
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
२०-०२.२०१४ करतारपुर जालंधर पंजाब
१०-३०-११.१५ मध्याह्न
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नैन चढ़ी काली-काली ये
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मंत्री जी क़ी नयी नवेली
भैंस बड़ी अलबेली
ऐसी डुबकी मारी भैया
बन गयी अजब पहेली
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घन-घन घंटी बजी रात भर
पुलिस महकमा जागा
होमगार्ड संतरी सेक्रेटरी
एस पी डी एस पी सब भागा
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काला अक्षर भैंस बराबर
काला ही मन भाये
काला कोयला काले धन में
मन जोगी रम जाए
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नैन चढ़ी काली-काली ये
भैंस खोज शुभ लाये
दूध धन्य नेतागिरी में
हुयी वरक्कत नजर नहीं लग पाये
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मंदिर-मस्जिद पूजा -मन्नत
भैंस जल्द मिल जाए
नहीं नौकरी कितनी मुश्किल
गयी ! जेल हो जाए
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आसू सांई नारायण सी भैंसी
गुप्त गुफा पगुराये
ड्राई फ्रूट चबाया जो था
वही हजम हो जाए
---------------------------
चारा कोई और खा गया
क्या चरने को आये
ए.सी. कूलर हीटर ऊटर
भैंस के मन ना भाये
---------------------------
काली-काली गाय भैंस सब
हांक -पकड़ कर लाये
कौन गाय हैं भैंस कौन है
अब ये समझ ना आये
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ज्ञानी -ध्यानी कुछ विज्ञानी
टेस्ट परख आजमाए
चुप्पी साधे 'थी' मंत्री क़ी
बाकी पशु चिल्लाये
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देशी को है कौन पूछता
ये तो कोई विदेशी होगी
सारा अमला पूछ सरीखा
पीछे-पीछे सदा घूमता
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अब लो दूध पियो हे राजा
बने रहो मुश्तंद
पहलवान के दल में जैम के
कुश्ती दांव दिखाओ रंग
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भूखी -प्यासी जनता बच्चे
दूध -दरश ना पाएं
अंधे-बूढ़े-रोगी जल्दी
सदा पटखनी खाएं
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बलशाली हो चुन के राजा
वे भूखे ही लाएं
जिसकी लाठी भैंस उसी क़ी
कालिदास दे जाएँ
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
७.४०-८.२० पूर्वाह्न
करतारपुर पंजाब
१६.०२.२०१४
__________________
‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले
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