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Old March 19th, 2013, 08:49 PM
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सरकार बड़ी या मुल्क!

Editorial in Punjab Kesari On 20 Mar 2013
कुछ लोग फिलहाल मेरे इस मत को ख्याली पुलाव बता सकते हैं कि अमरीका ने हमें श्रीलंका के तमिल मुद्दे पर पूरी तरह उलझा दिया है। उसने बड़ी ही सफाई से राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार सत्र में रखे जाने वाले अपने प्रस्ताव को ढीलाढाला बना कर पूरी जिम्मेदारी भारत पर डाल दी है कि वह अपने राज्य तमिलनाडु से जातीय एकता रखने वाले श्रीलंका के तमिल नागरिकों पर वहां हुए जुल्म की तीव्र निन्दा श्रीलंका की सार्वभौमिकता और संप्रभुता को चुनौती देते हुए दोनों देशों के बीच के राजनयिक सम्बन्धों की पवित्रता को तार-तार करते हुए करे। ऐसा करते ही भारत की स्थिति जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर अन्तर्राष्ट्रीय जांच के घेरे में आ जायेगी और इस राज्य की भौगोलिक व राजनीतिक स्थिति पूरी तरह खुद-ब-खुद विवादास्पद बन जायेगी क्योंकि जिस तरह की मांग मनमोहन सरकार में शामिल तमिलनाडु की द्रमुक पार्टी के अध्यक्ष श्री करुणानिधि श्रीलंका के तमिलों के बारे में कर रहे हैं ठीक वैसी ही मांग जम्मू-कश्मीर के कुछ राजनीतिक दल इस राज्य के सन्दर्भ में पाकिस्तान के साथ मिल कर रहे हैं।

जरा सोचिये क्यों स्व. राजीव गांधी के शासनकाल में भारत को मजबूर किया गया कि वह श्रीलंका की सिंहल व तमिल जातीय समस्या में अपना पैर अड़ाए और वहां के तमिलों द्वारा अलग 'तमिल ईलम' देश की मांग के लिए सशस्त्र संघर्ष को दबाये। याद कीजिये जब राजीव गांधी ने 1986 में श्रीलंका में भारतीय सेनाओं को भेजने का फैसला किया था तो सबसे पहला बधाई सन्देश उन्हें अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का मिला था और उसमें उनके इस कार्य की प्रशंसा की गई थी। श्रीलंका में सेना भेजने के बाद पहले स्व. राजीव गांधी पर श्रीलंका की जमीन पर ही गार्ड आफ आनर लेते हुए वहां के एक सैनिक ने हमला किया और बाद में तमिलों के सशस्त्र संगठन लिट्टे ने उनकी भारत की जमीन पर ही हत्या कर दी मगर द्रमुक पार्टी शुरू से ही लिट्टे की समर्थक रही और श्रीलंका के तमिलों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर भारत की विदेश नीति को तमिलनाडु केन्द्रित बनाने की कोशिश करती रही। मध्य ऐतिहासिक काल में दक्षिण के चोल राजाओं के शासन में रहने वाला यह देश पहले डच ईस्ट इंडिया कम्पनी के कब्जे में रहा और बाद में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के कब्जे में चला गया मगर तमिलों और सिंहलों के बीच 1920 में इसे भारत से अलग करते हुए अंग्रेजों ने ही बांटा और कालान्तर में 'कोलम्बो सीट' का सृजन करके इसे तमिलों और सिंहलियों के बीच बांट दिया वरना 1920 तक तमिल व सिंहली दोनों ही सीलोन राष्ट्रीय कांग्रेस के झंडे के नीचे संगठित होकर ब्रिटेन की दासता से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे लेकिन अंग्रेजों ने राजनीतिक प्रक्रिया में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व देने की प्रणाली शुरू करके इस देश में सामाजिक विग्रह के बीज बो दिये।

मैंने यह इतिहास केवल इसलिए लिखा है जिससे हम आज के भारत की स्थिति की हकीकत का जायजा गहरे नजरिये से ले सकें। अंग्रेजों ने ही 1947 में भारत को आजादी देते हुए इसे मजहब के आधार पर दो भागों में बांट दिया था। इससे अगले साल ही 1948 में श्रीलंका को आजादी मिली मगर उन्होंने सिंहलियों और तमिलों के बीच ऐसा बैर का भाव बो दिया कि तमिल अपने ही देश में किनारे पर पड़ गये मगर आज के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण यह है कि श्रीलंका की संप्रभुता के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ किये बिना हम किस तरह तमिलों के वाजिब अधिकारों की पैरवी कर सकते हैं? क्या इसका तरीका यह हो सकता है कि हम श्रीलंका की सरकार के खिलाफ अपनी संसद में प्रस्ताव पारित करके कहें कि वहां तमिल विद्रोहियों को समाप्त करने के लिए उसने अपनी फौज के जरिये जो अत्याचार किये हैं वह मानव संहार की श्रेणी में आते हैं? अमरीका ने अपने प्रस्ताव में इस शब्द का इस्तेमाल क्या इसलिए नहीं किया है कि यह काम भारत करे और अपने पड़ोसी देश के साथ सम्बन्धों को पूरी तरह खराब करके अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ले। श्रीलंका 'सिल्क रूट' के जमाने से चीन के करीब रहा है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका भारतीय उपमहाद्वीप में चीन के खिलाफ दूरगामी सामरिक रणनीतिक स्थिति को बड़ी ही होशियारी के साथ अंजाम देने में लगा हुआ है। हम चीन और अमरीका के बीच की इस स्थिति के लिए किसी भी तौर पर युद्ध क्षेत्र नहीं बन सकते हैं। जहां तक करुणानिधि की द्रमुक का सवाल है तो उसने मनमोहन सरकार से समर्थन लेने की औपचारिक घोषणा करने के साथ ही चुनौती फैंक दी है कि भारत सरकार श्रीलंका के खिलाफ अपनी संसद में प्रस्ताव पारित करके अमरीका के सपनों को पूरा करे जिससे कल को कश्मीर के हालत भी श्रीलंका के बराबर रखे जा सकें। मैं कांग्रेस पार्टी को चेतावनी देता हूं कि अगर वह इस तरफ कदम बढ़ाती है तो उसका सारा इकबाल मनमोहन सरकार के साथ ही खत्म हो जायेगा। सरकार अगर जानी है तो जाये मगर राष्ट्रीय हितों की बली देकर अगर कांग्रेस पार्टी मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाये रख कर गाड़ी खींचती है तो उसकी गाड़ी के सभी पहियों को इस देश की जनता इस तरह अलग-अलग करके दूर फैंकेगी कि न 'दो बैलों की जोड़ी' का कहीं निशान मिलेगा और न 'गाय-बछड़ा' कहीं दिखाई देगा और न 'हाथ' की छाप ही कहीं नजर आएगी। सरकारें कुर्बान की जा सकती हैं मगर हिन्दोस्तान का रुतबा और एहतराम नहीं। वैसे भी इस लुंज-पुंज सरकार का क्या मतलब रह गया है। अब तो हवाओं (आम जनता) को ही इस मुल्क की किस्मत का फैसला करना होगा। साथ ही भाजपा को भी चेताता हूं कि वह 'कमलों' की 'खिल्लो रानी' बनने की कोशिश न करे।
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Whenever you think that you are arguing with a fool, you must make sure that he is not doing the same.
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Old October 17th, 2013, 04:09 AM
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punjabi lion punjabi lion is offline
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Re: सरकार बड़ी या मुल्क!

that is the problem my friend. due to wrong policy of our govt, no nabieour country is our friend.
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