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Old February 11th, 2011, 08:52 AM
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Thumbs up Patang – A COLLECTION OF HINDI POEMS (KAVITA) BY bhramar.

मै पिजड़े का तोता हूँ

------------------

मै पिजड़े का तोता हूँ

इधर से उधर

उधर से इधर

फुर्र -फुर्र उड़ता हूँ

चलता हूँ -घूमता हूँ

कसरत करता हूँ

उल्टा लटकता हूँ

सर्कस सा

मीठा-मीठा मिट्ठू -मिट्ठू

बोलता हूँ -बुलाता हूँ

'कुछ ' हैं अपने

समझते हैं मेरी भाषा

बोलते हैं मुझसे

बड़ा प्यारा लगता है

मै न्योछावर

अपनी गर्दन तक

दे देता हूँ

उनके हाथों में

मेरी मेहनत पे वे

डाल देते हैं कुछ दाना

खाना-पानी

और 'कुछ' तीखी मिर्ची

बड़ा प्रेम है -मुझे -

'अपनों से '

ये मेरे 'कुछ अपने '

दूजे को देख चाँव -चाँव कर

भगा देता हूँ

चाहे मेरे माँ-बाप, सगे हों

चीखता हूँ -चिल्लाता हूँ

बड़ा मजा आता है

तब-मेरे 'अपनों ' को

कभी मेरे 'अपनों' का

मेरी तरफ

बढ़ता हाथ देख

न जाने क्यूँ ?

बड़ा डर लगता है

'अपनों ' से ही

चाँव-चाँव चीखता हूँ

फड़फड़ाता हूँ

मन कहता है उड़ जाऊं

कहीं दूर गगन में

'पर' लगता है

'पर' क़तर गए हैं

'वे' नोंच न खाएं

अजीब दुनिया है

कौन है मेरा ??

मन मसोस कर रह जाता हूँ

फिर वही उछल-कूद

कसरत , पिजड़े में कैद

मिट्ठू -मिट्ठू -मीठा मीठा

बोलने लगता हूँ

--------------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर '५

४.१०-४.४० मध्याह्न

करतारपुर -जालंधर पंजाब
२3.2.2014


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं




PATANG – HINDI POEM-BHRAMAR.

Hava chali purjor,
Haath me aai inke doar,
Udti rahi patang,
Vah vahi ye
Khusi –Malang.

Kitne baithe log,
‘dheel’di saari,
hava kahan hai kaisi,
dushman kitne,
najar gadaya,
unchi tirchhi chaal,
‘Kaat’ jo tumko,
samajh n aaye,
to kyon chale-
udane usko,
‘gur’ sikho kuchh,
unse tum bhi,
unchi aaj udate,
chhaye duniya me,
kal se ‘ve’
tike huye hain baithe,
aandhi tufaan dhoop,
andhera. Badal-
pal pal chhaye,
kabhi gire kuchh
paare sa ye .
lahraati ud jaye,

‘Race course’ me-
aaye ho to,
buddhi lagao,
‘chaar’ bulao,
gyan samiksha,
sab kuchh tere ‘haath’-
abhi uda jo
unchi paye- kal
Agni Prithvi saath,

Daudo bhago
Tej udao,
Upar neeche,
Kaat ke lao,
Inhe bachao,
Is ‘patang’ me ,
Baithe saare kitne log.

Surendrashukla “bhramar”
7.45PM 9.2.11 Jal (PB)
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

सूखी कड़ाही में तरती पूड़ी ( दहेज़ की बलिवेदी )

सावन का महीना
हरियाली - कजरी
कारे बदरा उमड़ -घुमड़ डराए
खुरपी -पलरी लिए घास की
अम्मा दौड़ी आई द्वारे
दामाद -बेटी के अचानक
घर आने की खबर सुन
थी सकपकाई
आस पास दौड़
सुब कुछ जुटाई
चूल्हे के पास धुएं में
बैठ बिटिया अम्मा संग
आंसू पोंछ -पोंछ
जी भर के बतियाई
पूड़ी कढ़ी
दामाद आया
कोहनी से मार- रूपा को
"उसने" -खूब उकसाया
"कुछ" कहने को
हलक में अटके शब्द
रूपा को गूंगा बनाये
फिर बिदाई
एक बंधन में बंधी गाय
चले जैसे संग -
किसी कसाई
गले लिपटी रोये
आंसू से ज्यों सारी यादें
धोती लगे - नीर इतना -
ज्यों बाढ़ सब कुछ
बहा ले जाए
अम्मा की मैली पुरानी साड़ी
सूखी कड़ाही में तरती पूड़ी
ज्यों सूखे सर में फंसा कमल
छटपटाना
घर का गिरता -छज्जा -कोना
देखती --चली ---गयी ......
और कल सुबह
खबर आ पहुंची
स्टोव फट गया
अरी ! बुधिया करमजली
रूपा ..तेरी बिटिया
तो जल गयी .........
----------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर"५
जल पी बी २७.०७.२०११ ५.४५ पूर्वाह्न


-------------------------------------------------

"मै" मेरी खाल-मेरा ढोल (थाली बजाओ)
दिल में उठा एक जूनून
जोश -खौलता खून
कलयुग की आंधी
श्वेत वस्त्र- एक टोपी-
खादी -सूखी रोटी
बड़ी लडाई लड़ते आया
मरते-मरते बचते आया
दो चार लोग पीठ ठोंक
आगे झोंक देते
हम देख लेंगे
पीछे हैं हम आप के
नगाड़ा पीटिये
ढोल बजाइए
थाली बजाइए
बहरों को जगाइए
आवाज बुलंद हो
संसद हिल जाए
जनता खिल जाए
जनता मालिक है
अपने पसीने की - खाने का
अधिकार है -
भूखे को अनशन का !
खुद बोया तो खुद काटे
काहे काले कौवों को बाँटें !
---------------------------
भीड़ जुटी -एक-दस-सौ -लाख
रावण का पुतला जलाने को
तमाशा-राम और रावण
महाभारत बनाने को
दो मुहे सांप-मीडिया-बाजीगरी
--------------------------------------
पर अगले कुछ पल थे भारी !
धमाका -धुंआ -धुन्ध
चीख पुकार द्वन्द
रावण - राक्षस बिखर गए !
रक्त-बीज बन -फिर
जम गए -थम गए !!
अँधेरे कोहराम धुन्ध के आदी थे
और उधर मैदान-ए-जँग में -बाकी थे
"एक" अभिमन्यु
चरमराता हमारा ढाँचा
मै -मेरी खाल-मेरी ढोल
जिसमे था बड़ा पोल
आवाज ही आवाज बस
पीछे मेरे दस लाख करोड़ से
करोड़ -लाख-दस जा चुके थे
कहाँ ये कंगाल के साथ कब रहे हैं ???
शिखंडी-दुर्योधन-धृत-राष्ट्र
बेचारी ये जनता ये अधमरा राष्ट्र
--------------------------------------
और पानी की तेज बौछार
ने मेरी आँखें खोल दी
धूल चाटते कीचड में सना पड़ा मै
जन गण मन अधिनायक जय हे !!!
गाता -कराह उठा !!!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर"५
००.२३ पूर्वाह्न
१०.०८.२०११ जल पी बी

--------------------------------------------

गुप-चुप-गुप-चुप
रजनी आई !!!

पहला मिलन
अनोखा ऐसा
कली से जब में
फूल बनी
नैनो का वो आमंत्रण
कितने आये और गए
होठों की मुस्कान खिली सी
दूर दूर ही चूम गए
चन्दन सा स्पर्श प्यार का
कभी छुए तो
कभी दूर से
पवन- झकोरे -से कितना कुछ
दूर दूर से भेज गए !
'खुश्बू' मेरी लेने को प्रिय !
कितने बार रोज मंडराए
छू पायें तो छू छू जाएँ
नहीं पास आने की कोशिश
सौ सौ चक्कर रोज लगाये
व्यर्थ गयी कोशिश उनकी सब
पहले मिलन का पहला भौंरा
मस्त -मदन -उन्मत्त आज वो
फूल के दिल में कैद हुआ
उस घर देखो
दिया बुझा अब
गुप-चुप-गुप-चुप
रजनी आई !!!
Bhramar5, http://surenrashuklabhramar.blogspot.com

----------------------------------------------------------------------
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन …….


————————————
तरह तरह की भाषाएँ हैं
भिन्न भिन्न है बोली
रहन सहन पहनावे कितने
फिर भी सब हमजोली
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन ……
———————————-
मन मिलते हैं गले मिलें हम
हर त्यौहार मनाएं
धूमधाम से हँसते गाते
हाथ मिलाये सीढ़ी चढ़ते जाएँ ..
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन …….
——————————————
बड़े बड़े त्यागी मुनि ऋषि सब
इस पावन धरती पर आये
वेद ज्ञान विज्ञानं गणित सब
दुनिया योग सिखाये …
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन …….
————————————-
आलस त्यागे बच्चे बूढ़े कर्म जुटे हैं
हरियाली खुशहाली देखो
घर घर में है ज्योति जगाये
लिए तिरंगा नापे धरती सागर चीरे
पर्वत चढ़ के आसमान हम छाये
चमक दामिनी सी गरजें जब
दुश्मन सब थर्राएँ
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन …….
—————————————–
कितने जालिम तोड़े हमको
लूटे – ले घर भागे
सोने की चिड़िया हम अब भी
देखो सब से आगे
जहां रहेंगे खिल जायेंगे
फूल से महके जाते
वे जलते कोयले सा बनते
हीरा हम सब चमके जाते
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन …….
——————————-
वीर जवानों वीर शहीदों
शत शत नमन तुम्हे ,
तेरे ऋण से उऋण कहाँ हे !
नक़्शे कदम पे तेरे जाके
है प्रयास हम प्रजा सभी का
झंडा ले हम विश्व पटल पे
भरे ऊर्जा जोश दोगुना
ऊंचाई चढ़ सूर्य से चमकें
पल पल हम गतिशील रहें !
भारत देश हमारा प्यारा
बड़ा अनोखा अद्भुत न्यारा
शत शत इसे नमन …..
—————————–
सुरेन्द्र शुक्ल भ्रमर ५
करतारपुर पंजाब
२६ जनवरी २०१२
८-८.१५ पूर्वाह्न

Last edited by shuklabhramar5; April 12th, 2014 at 07:43 AM. Reason: TO USE ALL MY HINDI POEMS IN ONE THREAD WITH DIFFERENT TITLES
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  #2  
Old February 11th, 2011, 03:27 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

Hindi font ka use karo sir - english me hindi padhne me kathinai hoti hai.
Kis patang ki baat kar rahe ho - kuchh meaning samjhao.
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  #3  
Old February 11th, 2011, 05:40 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

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Originally Posted by Napolean View Post
Hindi font ka use karo sir - english me hindi padhne me kathinai hoti hai.
Kis patang ki baat kar rahe ho - kuchh meaning samjhao.
Raajnitik vyangya maarne ki koshish ki gayi hai...
achchha hai Shukla jee... likhte rahiye... welcome to EC.
__________________
I am here because I am nowhere else. But, am I there where I wanted to be?

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  #4  
Old February 12th, 2011, 10:51 AM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

hamra jabab to chitrala saab ne de hi diya ...vahi patang jisme hm sb baithe hain ..ye desh hamara aur ise chalane vale ......jyada clear karna theek naikhe n sir ..........
surendrashuklabhramar
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  #5  
Old February 12th, 2011, 01:13 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

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Originally Posted by shuklabhramar5 View Post
hamra jabab to chitrala saab ne de hi diya ...vahi patang jisme hm sb baithe hain ..ye desh hamara aur ise chalane vale ......jyada clear karna theek naikhe n sir ..........
surendrashuklabhramar


तो फिर हिंदी मै टाईपिंग करने मै गुदा द्वार मै दर्द होता है क्या?
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Sansaar chhe.....Chalyaa kare..........
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  #6  
Old February 12th, 2011, 01:16 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

http://www.google.com/transliterate/indic/


ये रहा एक बेहतरीन उपकरण हिंदी माध्यम मै मुद्राकरण करने के लिए.
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Sansaar chhe.....Chalyaa kare..........
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  #7  
Old February 12th, 2011, 01:31 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

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Originally Posted by AmthaLal View Post
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ये रहा एक बेहतरीन उपकरण हिंदी माध्यम मै मुद्राकरण करने के लिए.
दिश लिंक इज गुड

लेकिन क्या बोल रहे हो आम था लाल प्राजी.. एवरी थिंग वेंट ओवर हेड..
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  #8  
Old February 12th, 2011, 01:37 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

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Originally Posted by sarv_shaktimaan View Post
दिश लिंक इज गुड

लेकिन क्या बोल रहे हो आम था लाल प्राजी.. एवरी थिंग वेंट ओवर हेड..
थरेअद को डेरेल न करो कोई अची सी कविता चिपकाओ
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  #9  
Old February 12th, 2011, 02:06 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

[quote=AmthaLal;542905]तो फिर हिंदी मै टाईपिंग करने मै गुदा द्वार मै दर्द होता है क्या? [/quote


हे राम अमथलाल जी हमें सभ्य भाषा का उपयोग करना चाहिए है न और वो भी आप से वरिष्ठ लोगों को तो देश का ख्याल करना उदहारण रखना चाहिए न धन्यवाद - सुकुमारशुक्ला भ्रमर
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  #10  
Old February 12th, 2011, 09:11 PM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

[quote=shuklabhramar5;542915]
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Originally Posted by AmthaLal View Post
तो फिर हिंदी मै टाईपिंग करने मै गुदा द्वार मै दर्द होता है क्या? [/quote


हे राम अमथलाल जी हमें सभ्य भाषा का उपयोग करना चाहिए है न और वो भी आप से वरिष्ठ लोगों को तो देश का ख्याल करना उदहारण रखना चाहिए न धन्यवाद - सुकुमारशुक्ला भ्रमर
अमथाजी वरिष्ठ है या नही, इसका तुम्हे कैसे भान है मियाँ? हाय्ं? अगर कल को हम अपने नाम के नीचे गाँधीजी की फोटू लगा लें तो क्या हम अधिक वरिष्ठ हो जाएँगे?
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Nietzsche (1887) : God is dead
God (1900) : Nietzsche is dead
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I will not be hurried and I will not be bullied

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  #11  
Old February 13th, 2011, 12:30 AM
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

[quote=raniraja;542937]
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Originally Posted by shuklabhramar5 View Post
अमथाजी वरिष्ठ है या नही, इसका तुम्हे कैसे भान है मियाँ? हाय्ं? अगर कल को हम अपने नाम के नीचे गाँधीजी की फोटू लगा लें तो क्या हम अधिक वरिष्ठ हो जाएँगे?

एक लोमड़ी खाल ओढ़कर
नानी बनकर आई
पढ़ा नहीं नन्हे थे जब तो
क्या अंत में पायी
रानी राजा जी
मन से राजा रानी
बनकर हम सब से जुड़ जाओ
भ्रमर
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  #12  
Old February 13th, 2011, 01:34 AM
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“घाव ” बना नासूर -भ्रमर -हिंदी पोएम

“ घाव ” बना नासूर -भ्रमर - हिंदी पोएम

छोटी सी एक ,
सुई चुभी थी ,
आज बना वो “ घाव ”,
कुछ दिन “घाव ” –
को यूं ही छोड़ा ,
उससे रहता – दूर ,
इस दुनिया की ,
कीचर मिटटी ,
जहर -विषैले ,
लगते -लगते ,
खून टपकता ,
“घाव ’’ हुआ नासूर .

अब चाहूँ मै ,
साफ़ करूँ नित ,
डॉक्टर – वैद्य
दिखाऊँ - या –
जाऊं मै - गंगाजल –
ला खूब इसे नहलावुं ,

सडा गला ये ,
“घाव ” तुम्हारा ,
तेरा साथ देगा ,
लोग कहें -डॉक्टर –
संग बोलें – काट -
फेंक दो – इसको .

तुमको और अगर -
है जीना …
बाकी ‘ अंग ’ बचाना ,
जल्दी से तुम निर्णय
ले लो -बाद नहीं -
पछताना .

कैसे अपना ,
‘ अंग ’ काट दूं ,
मेरा कितना प्यारा ,
बोझिल मन -न -
निर्णय करता –
कोर्ट कचेहरी –
से भी डरता -
बिनाआज्ञा - या
सलाह बिन ,
‘ अनुचित ’ –
काम -न -करना -
सीखा -फिर भी
कितना “ जीनामुश्किल ”
देखरहा – अब सीखा .

सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमार .
३ .२५ पूर्वाह्न जल (पब ) ११ .२ .२०११ [font=comic sans

Last edited by shuklabhramar5; April 6th, 2011 at 02:24 AM. Reason: new post added
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Old February 13th, 2011, 10:01 AM
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Thumbs up A collection of hindi poems (kavita) by "bhramar" “पगली,पतंग,नारी ”

“ पगली ” – भ्रमर – हिंदी पोएम (कविता) .
पगली इतना
गट्ठर बांधे ,
गली गली
मुस्काते चलती ,
आँखों से वो
करे इशारे ,
नैन मटक्का ,
फटी हुई धोती
से अपने ,
गली बुहारे ,
दरवाजे जा -
खड़ी गाड़ियों ,
के शीशे में
खुद को देखे ,
चमकाए फिर
कमर नचाये ,
बल खाते -
लहरा के चलती ,

पगली इतना
गट्ठर बांधे ,
गली गली
मुस्काते चलती ,

उसका घर था ,
बेटे – बेटी ,
बातें करती
आसमान से ,
उनसे लडती
खड़ा सामने ,
कोई भी -
ना देखा करती ,
श्मशान में
जाकर सोती ,
पल दो पल
जी भर के रोती ,
फिर अपना वो
गट्ठर बांधे ,
चली शहर में -
आया करती ,

पगली इतना
गट्ठर बांधे ,
गली गली
मुस्काते चलती

गिला शिकवा ,
किस्से भी - ‘ वो ’
कूड़ा करकट -
कुत्तों के संग
भाग दौड़कर ,
“ रोटी ” अपना -
खाया करती

पगली इतना
गट्ठर बांधे ,
गली गली
मुस्काते चलती

सुरेंद्रशुक्लाभ्रमर
१३ .२ .११ जल (पी बी ) ४ .४५ पूर्वाह्न

कनक कनक रम बौराया जग

किसको किसको मै समझाऊँ
ये जग प्यारे रैन बसेरा
सुबह जगे बस भटके जाना
ठाँव नहीं, क्या तेरा-मेरा ??
आंधी तूफाँ धूल बहुत है
सब है नजर का फेरा
खोल सके कुछ चक्षु वो देखे
पञ्च-तत्व बस, दो दिन मेला
——————————–
कनक कनक रम बौराया जग
भौतिक खेल-खेल में डूबा
पीतल चमक खरा सोना ना
बूझ पहेली पूरा-पूरा
हीरा कोयले में मिलता रे !
यह जग प्यारे बड़ा अजूबा
——————————–
सूरज ना धरती से निकले
नहीं समाये ये रे ! धरती
ललचाये ना -’देखा’ होता
सार-सार गहि तजि दे थोथा
खाद उर्वरक कर्म न डाले
क्या पायेगा वंजर धरती
————————–
कभी चांदनी कभी अँधेरा
सूखा वर्षा फटता बादल
रचा कभी पल मिट है जाता
देख ‘सूक्ष्म’ सत का हो कायल
कुदरत ने भेजा रचने को
जोश प्रेम से रच हे! पागल
—————————–
लोभ मोह ना करे संवरण
ईहा क्रोध राग अति घातक
शान्ति-त्याग जप जोग वरन कर
ऋणी ऋणात्मक काहे पातक ?
तू न्यारा तेरी रचना न्यारी
प्रिय बन जा रे ! मन कर पावन
———————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
६.२५ पूर्वाह्न -७.०० पूर्वाह्न
करतारपुर जालंधर पंजाब
४.०३.२०१४
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

लाख हजार दिए विधवा को
————————-
छल बल सारे अस्त्र से
जनता रहे डराय
बोटी-बोटी काट दूं
जो हमरे आड़े आय
जाति धर्म में बाँट के
हर गुट करते राज
ईमाँ इन्सां जो चले
धोखा हर पल खाय
हम जो चले सफाई देते
सौ सौ प्रश्न लिए आते
उन गुंडों के पास वे
एक नहीं लेकर जाते
आँख तरेरे छीन कैमरा
जान की धमकी दे जाते
अपने विकास को आसमान पे
जनता घुट्टी पिलवाते
राज-नीति अब है गन्दी
‘वे’ मिल हमको लड़वाते
लाख हजार दिए विधवा को
फोटो अपनी छपवाते
कितने मरे -मिले ना अब तक
‘राज’ -राज ये कैसा भारत ?
गर्व करें हम जिस संस्कृति की
आओ झांके क्या ये भारत ?
चीख पुकार शोरगुल भय है
निशि दिन होता अत्याचार
हे ! माँ भारति न्याय कहाँ है ?
क्यों कुनीति दम्भी का राज ?
प्रेम सहिष्णुता दया दबी रे !
सच्चाई का बलात्कार
डर डर जनता खाती जीती
चंहू ओर बस हाहाकार
‘भ्रमर’ कहें जनता जनार्दन
शक्ति अपनी पहचानो
पांच साल से कुम्भकर्ण थे
जागो-देखो-कुछ कर डालो
छल से बच रे ! मीठा बोल
“वोट’ नकेल ‘मगर’ डालो …
—————————–
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ५ ”
जम्मू ३०.०३.२०१४
६.२० -६.५० पूर्वाह्न
__________________
‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले

Last edited by shuklabhramar5; April 12th, 2014 at 07:52 AM. Reason: TO USE ALL MY HINDI POEMS IN ONE THREAD WITH DIFFERENT TITLES
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  #14  
Old February 13th, 2011, 10:21 AM
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Re: “पगली ” –भ्रमर –हिंदी पोएम (कविता) .

बुरा मत मानियेगा भरमार साहिब.... एक अौर चालू कविता फिर एक नये थ्रेड में... नकारात्मक मत प्रदान कर रहा हूँ... पुरानी लोमड़ी बुरा तो नहीं मानेगी...
__________________
I am here because I am nowhere else. But, am I there where I wanted to be?

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  #15  
Old February 13th, 2011, 10:30 AM
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Re: “पगली ” –भ्रमर –हिंदी पोएम (कविता) .

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Originally Posted by chitrala View Post
बुरा मत मानियेगा भरमार साहिब.... एक अौर चालू कविता फिर एक नये थ्रेड में... नकारात्मक मत प्रदान कर रहा हूँ... पुरानी लोमड़ी बुरा तो नहीं मानेगी...
चित्राला सर जी सेम थ्रेड को कैसे प्रयोग करें कल भी उपाय पूछा था हमें बताया नहीं कृपया बताएं और नकारात्मक की जगह प्रोत्साहन दीजिये कविता में ध्यान दे चालू नहीं है पगली की जिंदगानी है आँखों देखी सधन्यवाद

सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमर
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koyla-sookhi roti, naari, pagli, patang


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