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  #106  
Old October 4th, 2013, 12:39 PM
sarv_shaktimaan's Avatar
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

I don't know who wrote this poem or its title.. Got it as a forward on whatsapp..

its absolutely lovely and I get a lump in my throat every time I read it.

Quote:
एक माँ चटाई पे लेटी आराम से सो रही थी...

कोई स्वप्न सरिता उसका मन भिगो रही थी...

तभी उसका बच्चा यूँ ही गुनगुनाते हुए आया...

माँ के पैरों को छूकर हल्के हल्के से हिलाया...

माँ उनीदी सी चटाई से बस थोड़ा उठी ही थी...

तभी उस नन्हे ने हलवा खाने की ज़िद कर दी...

माँ ने उसे पुचकारा और फिर गोद मेले लिया...

फिर पास ही ईंटों से बने चूल्हे का रुख़ किया...

फिर उसने चूल्हे पे एक छोटी सी कढ़ाई रख दी...

फिर आग जला कर कुछ देर उसे तकती रही...

फिर बोली बेटा जब तक उबल रहा है ये पानी...

क्या सुनोगे तब तक कोई परियों वाली कहानी...

मुन्ने की आँखें अचानक खुशी से थी खिल गयी...

जैसे उसको कोई मुँह माँगी मुराद हो मिल गयी...

माँ उबलते हुए पानी मे कल्छी ही चलाती रही...

परियों का कोई किस्सा मुन्ने को सुनाती रही...

फिर वो बच्चा उन परियों मे ही जैसे खो गया....

सामने बैठे बैठे ही लेटा और फिर वही सो गया...

फिर माँ ने उसे गोद मे ले लिया और मुस्काई...

फिर पता नहीं जाने क्यूँ उनकी आँख भर आई...

जैसा दिख रहा था वहाँ पर सब वैसा नही था...

घर मे इक रोटी की खातिर भी पैसा नही था...

राशन के डिब्बों मे तो बस सन्नाटा पसरा था...

कुछ बनाने के लिए घर मे कहाँ कुछ धरा था...

न जाने कब से घर मे चूल्हा ही नहीं जला था...

चूल्हा भी तो बेचारा माँ के आँसुओं से गला था...

फिर उस बेचारे को वो हलवा कहाँ से खिलाती...

उस जिगर के टुकड़े को रोता भी कैसे देख पाती...

वो मजबूरी उस नन्हे मन को माँ कैसे समझाती...

या फिर फालतू मे ही मुन्ने पर क्यूँ झुंझलाती...

इसलिए हलवे की बात वो कहानी मे टालती रही...

जब तक वो सोया नही, बस पानी उबालती रही.....
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  #107  
Old October 4th, 2013, 05:46 PM
dhurandhar's Avatar
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Dhureshvar Dhuracharya
 
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Re: Patang – hindi poem-bhramar.

Quote:
Originally Posted by sarv_shaktimaan View Post
I don't know who wrote this poem or its title.. Got it as a forward on whatsapp..

its absolutely lovely and I get a lump in my throat every time I read it.
...kabhi aisi takdeer kisi ki na ho
__________________
Hum woh hai jo vidhaata ka bhagya likhte hai
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  #108  
Old April 12th, 2014, 06:49 AM
shuklabhramar5's Avatar
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Re: “घाव ” बना नासूर आओ 'होली' जल्दी आओ -जियरा जरा ज

Quote:
Originally Posted by shuklabhramar5 View Post
[size="6"]आओ 'होली' जल्दी आओ - जियरा जरा जुड़ाई-
“holi contest”

होली आई मेरे भाई बन - ठन के

रंगीली जैसे नारि हो .....
पिया के स्वागत तत्पर बैठी
छप्पन भोग बनाये
गुल - गुलाल हर फूल बटोरे
छन - छन सेज संवारे
[font=mangal] घूंघट[ /font] उठा उठा केताके
घर आँगन क्षन - क्षन में भागे
हवा बसंती - कोंपल- हरियाली
तन में आग लगाये
खिले हुए हर फूल वो सारे
मुस्काएं - बहुत - चिढ़ाएं
कोयल भी अब कूक- कूक कर
" कारी " - करती जाये
सुबह ' बंडेरी ' - ' कागा' बोले
' नथुनी ' हिल -हिल जाये
होंठों को फिर चूमि - चूमि के
दिल में आग लगाये
कहे सजन चल पड़े तिहारे
जागे - गोरी ' भाग ' रे
आँगन तुलसी खिल - खिल जाये
हरियाली ' पोर ' - ' पोर ' में छाये
रंग - बिरंगी तितली जैसी
भौंरो को ललचाये
रंग गुलाल से डर- डर मनवा
छुई - मुई हो जाये
पवन सरीखी - पुरवाई सी
गोरी उड़ - उड़ जाये
चूड़ी छनक - छनक ' रंगीली '-
होली याद दिलाये
सराबोर कब मनवा होगा
मोर सरीखा नाचे
पपीहा - पिया - पिया तडपाये
बदरा उडि - उडि गए " कारगिल "
" काश्मीर "-" लद्दाख "
गोरिया विरहा -" रैना " मारी
भटके कोई सागर तीरे
कोई कन्या - कुमारी
बंडवा - नल -' सुख' -' सोख ' ले रहा
फूल रहा - कुम्हिलाई
आओ ' होली ' जल्दी आओ
कान्हा को लई आओ
सावन के बदरा [font=mangal] से[ /font] बरसो
जियरा जरा जुडाई

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रम र
३०..२०११
[/size]

'लाल' नहीं पाया ना 'प्याला'


( photo with thanks from google/net)
मधुशाला में मधु है उसकी
चोली दामन साथ निभाती
दिल की हाल बयाँ करते हैं
चार यार संग बन बाराती
----------------------------
कभी हँसे 'कद' रोया करदे
नाच झूम मन की सब कह्दे
दर्द-दवा-है वैद्य वहीं सब
अपनी कहदे उनदी सुनदे
---------------------------------
एक 'कमाई'- बेंच के लाता
चार मौज मस्ती रत रहते
कहीं कोई खाली जो आता
कभी धुनाई गिर पड़ खाता
---------------------------------
एक-एक पैग जो अंदर जाते
भाव भरे हर व्यथा सुनाते
सच्चा इंसा हूँ मै यारों
'पागल' दुनिया घर फिर आते
----------------------------
बात-बात में बने बतंगड़
धक्का-मुक्की दिन या रात
कभी ईंट तो मारें कंकड़
गली मोहल्ला ज्यों बारात
--------------------------------
'छज्जू' के हैं छह-छह कुड़ियां
दिखती सारी प्यारी गुड़िया
जाने कौन कर्म ले आयीं
प्रेम में रत या जहर की पुड़िया ?
--------------------------------
'कुछ' कहती ये बड़ा शराबी
'पी' लेता तो बड़ी खराबी
'लाल' नहीं पाया ना 'प्याला'
समझो ना फिर -इसको घरवाला
-----------------------------------
बद अच्छा बदनाम बुरा है
किया हुआ हर काम बुरा है
'सच्चाई ' दबती फिर जाती
गली मोहल्ले 'वही' शराबी ....
----------------------------
दुश्मन पागल, आवारा सा चीखे
लट्ठ लिए पागल सा घूमे
कभी किसी की चोटी खींचे
मार के रोता आँखें मींचे
--------------------------------
मै ना कोई शराबी यारा
'बदचलनी ' के गम का मारा
भटकी बीबी कुड़ियां जातीं
नाक है कटती शर्म है आती
-------------------------------
'यार' बड़े उनके हैं सारे
आँख दिखा मुझको धमकाते
रोता दिल 'नासूर' अंग है
काट सकूं ना -ना-पसंद हैं
-----------------------------------
माँ की सहमति से बालाएं
सजधज मेकअप जाएँ-आयें
'पप्पा' को मिटटी बुत समझें
चैटिंग पूरा दिवस बिताएं
-------------------------------
उस दिन पुलिस बुलायी थी तू
बैठक दंड कराये खुश थी
आज बनाऊंगा मै मुर्गी
याद रखेगी जीवन भर तू
-----------------------------
'छज्जू' बोला आज हे मुई
मर जाऊंगा 'धर' तारां ( बिजली) मै
रोज-रोज मरता है क्यों भय
मर जा -जा मर तंग मै हुयी
-------------------------------
लिए लट्ठ छत के ऊपर वो
गया थामने 'बिजली' दामन
चीख पुकार शोर रोना 'हुण'
लाठी ईंटों की फिर वो धुन
----------------------------
पापा ! मम्मी ! , रोती कुड़ियां
सच्ची-प्यारी- मार भी खाईं
हंसी व्यस्त कुछ कथा सुनाती
मै सच्ची हूँ , अजब ये दुनिया ....
---------------------------------
हुआ इकठ्ठा रात मोहल्ला
'गबरू' कुछ फिर चढ़े बढे घर
'छज्जू' भागा कूद-फांदकर
कान पड़ी जब पुलिस-पुलिस तब
-------------------------------
कौन है सच्चा कौन है झूठा ?
दया रहम दोनों पर आती
'रोजगार' ना कभी 'गरीबी'
'इन्हे' इसी मन्जिल पहुंचाती
---------------------------
'सपनों' में जीने की खातिर
कभी दिखावा -'पेट' की खातिर
लता-बेल 'कांटे' चढ़ जातीं
या दल-दल में फंसती जातीं
----------------------------
पति-पत्नी का कैसा रिश्ता ??
मिले 'लाल' ही है मन मिलता
तन-मन प्रेम सभी का हिस्सा
नहीं प्रेम कल का बस किस्सा
--------------------------------
अपराधी हैं ताक में रहते
बिगड़े सब, 'कुछ' तो बिक जाए
कौड़ी भाव में 'स्वर्ण' मिले तो
निज दूकान तो सजती जाए
---------------------------------
दोस्त शराबी के फिर आते
'साहस' दे गृह फिर दे जाते
'माँ' कहती हे! पास पडोसी
ना जाओ ना फिर 'वे' आते
-----------------------------
बुलबुल कहाँ कैद रह पाएं
खोलो पिजड़ा फिर -फिर आयें
रहें कहाँ ना साथी पाएं
निज करनी हैं पर कतराए
----------------------------
'रब' हे ! ऐसे दिन ना लाओ
शांति रहे, मन -मंदिर सुन्दर
प्रेम-पूज्य मूरति सीता-शुभ
राम 'परीक्षा-अग्नि' न भाओ
--------------------------------
सत्कर्मों से मिला सुघड़ तन
नरक वास हे! क्यों मन लाते
मनुज प्रेम 'मानव' निज तन कर
मृग मरीचिका क्यों भरमाते ??
-----------------------------------
( एक आँखों देखी सच्ची व्यथा कथा पर आधारित, प्रयुक्त सभी नाम काल्पनिक हैं और किसी के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं हैं , कुछ शब्द पंजाबी के प्रयुक्त हैं )
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
२०-०२.२०१४ करतारपुर जालंधर पंजाब
१०-३०-११.१५ मध्याह्न
=========================================================
नैन चढ़ी काली-काली ये
----------------------------
मंत्री जी क़ी नयी नवेली
भैंस बड़ी अलबेली
ऐसी डुबकी मारी भैया
बन गयी अजब पहेली
--------------------------

घन-घन घंटी बजी रात भर
पुलिस महकमा जागा
होमगार्ड संतरी सेक्रेटरी
एस पी डी एस पी सब भागा
---------------------------------
काला अक्षर भैंस बराबर
काला ही मन भाये
काला कोयला काले धन में
मन जोगी रम जाए
--------------------------
नैन चढ़ी काली-काली ये
भैंस खोज शुभ लाये
दूध धन्य नेतागिरी में
हुयी वरक्कत नजर नहीं लग पाये
-----------------------------------------
मंदिर-मस्जिद पूजा -मन्नत
भैंस जल्द मिल जाए
नहीं नौकरी कितनी मुश्किल
गयी ! जेल हो जाए
-------------------------------
आसू सांई नारायण सी भैंसी
गुप्त गुफा पगुराये
ड्राई फ्रूट चबाया जो था
वही हजम हो जाए
---------------------------
चारा कोई और खा गया
क्या चरने को आये
ए.सी. कूलर हीटर ऊटर
भैंस के मन ना भाये
---------------------------
काली-काली गाय भैंस सब
हांक -पकड़ कर लाये
कौन गाय हैं भैंस कौन है
अब ये समझ ना आये
---------------------------
ज्ञानी -ध्यानी कुछ विज्ञानी
टेस्ट परख आजमाए
चुप्पी साधे 'थी' मंत्री क़ी
बाकी पशु चिल्लाये
-----------------------------
देशी को है कौन पूछता
ये तो कोई विदेशी होगी
सारा अमला पूछ सरीखा
पीछे-पीछे सदा घूमता
---------------------------
अब लो दूध पियो हे राजा
बने रहो मुश्तंद
पहलवान के दल में जैम के
कुश्ती दांव दिखाओ रंग
-----------------------------------
भूखी -प्यासी जनता बच्चे
दूध -दरश ना पाएं
अंधे-बूढ़े-रोगी जल्दी
सदा पटखनी खाएं
-----------------------
बलशाली हो चुन के राजा
वे भूखे ही लाएं
जिसकी लाठी भैंस उसी क़ी
कालिदास दे जाएँ
--------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
७.४०-८.२० पूर्वाह्न
करतारपुर पंजाब
१६.०२.२०१४
__________________
‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले
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koyla-sookhi roti, naari, pagli, patang


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