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  #16  
Old February 28th, 2011, 03:14 AM
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Re: “ Koyla” maidan-e-jang me date yuva khikhiya rahe- Bhramar –Hindi poem

"मैदान-ए-जंग" में डटे युवा खिखिया रहे -

आज कुछ नया नहीं
ऊँघता उठा -चाय -चुस्की
नित्यकर्म-अख़बार
इसने लूटा -उसने मारा-
ये घोटाला -वो घोटाला
अपने कमरे में बैठा
इतनी बड़ी दुनिया -"ग्लोब"
ऊँगली से घुमाता रहा
करीने से सजा -सजाया कमरा
किताबें -पोथी -कुछ पन्ने
बस - एक कवि की अमानत
बाहर शीत लहर -शर्द हवाएं
धुंध का आवरण
जिसमे जुड़ा है -धुंआ
चूल्हे में जलती लकड़ी का -
मिल का -
भांय-भांय-दौड़ती गाड़ियों का
श्मशान में -दुनिया को विदाई
देते गम का -
बाहर अंधकार -हमें क्या
उससे -सरोकार !
खून गरमाया -खेत-मैदान-
मंदिर -बाजार-स्टेशन
घूमने निकला - देखा
मंदिर में भीड़ -शोरगुल
घंटे -शंख-भजन-कीर्तन
ऊँचेशिखर-जमींपरबैठे
लोग -कतार में -कुछ के
हाथ में कटोरियाँ --रटा-रटाया
एक 'जबान'- दे दाता के नाम -
तुझको अल्ला - रक्खे राम !!!
स्टेशन पर जुदा होते
लोगों का दर्द -विरह
ट्रेन पकडे -कुछ दूर दौड़ते लोग
अंत में दो आंसू टपकाने को
- "खोया" - किसी ने - झकझोरा -
एक युवती -एक कोपीठमें बांधे -
दो को पीछे घुमाते..
बाबू- दे न कुछ पैसे -
शादी है बेटी कुआंरी है -
घर जल गया है -
फिर ..एक युवक.. मेरी जेब कट गयी
-घर जाना स़ाब- टिकटभरका ..
next in other page>>>>>>>
-----------------------------------------------------------------------------

किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?

हाथी मेरा खाता पीता
सुस्त चले - रहता बस सोता
अश्वमेध का सपना आया
घोडा चुन-चुन लाया
हाथी पर चढ़ कभी परिक्रमा
जब पूरी ना हो पायी
अश्वशक्ति - कुछ मंत्री- तंत्री
ले उधार तब-इच्छा पूरी कर पायी
सूरज ढलने को आया जब
अँधेरा ना हो जाए !
इसी लिए घर आग लगाया
उजाला -कुछ दिन रह जाए !!
उत्तर हाथी, उत्तर काशी
उत्तर शिला -उत्तर लोढ़ा
चार धाम- मन में आया
साँसें अटकी -जीवित क्यों हूँ
संसद में ला पास करा लूं
अपनी मूरति - कुछ गढ़वा के
चौराहे - मंदिर -में ला -दूँ

---------------------------------
उसका ख्याल ये देख -देख कर
दल-दल मै फंसता जाऊं
अभी एक हैं भाई मेरे
जाऊं थोडा मिल आऊँ !
कल वे बँटे दीवारों होंगे
किस घर बैठूं - किसका खाऊँ ?
-------------------------------
बार्डर पर जाते ही भैया
एक -मुछंडे ने - रोका !
“बौने” छोटे- वहां बहुत हैं
तेरा "कद" अब भी ऊंचा !!
वीसा -पासपोर्ट -ले आओ
बंट जाए- तो फिर- घर जाओ
अब वो गाँव देश ना प्यारा
अब ये है पर-देश
मारा मारी -विधान -सभा में
नहीं मिला सन्देश ??
-----------------------------------
दो रोटी खाकर मै जीता
कीचड़ वाला पानी भाई
सूखे कुएं का - अब तक पीता
ये कंकाल लिए अपना मै
कैसे पासपोर्ट बनवाऊँ ?
मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं
भय है- ना नोचा जाऊं !
----------------------------------
मन चाहे पत्थर की मूरति से
मिल मै - कुछ रो आऊँ
हाड मांस का पुतला अपना
आंसू - थोडा दिखलाऊँ
-------------------------
इस आंसू में शक्ति बहुत है
थोडा उनको समझाऊँ !
जो सजीव "पाथर" हैं मिल लूं
आँख मिला के -बतलाऊँ
जहर भरा है जिनके रग में
आंसू थोडा- मिला के आऊँ !
मुई खाल की सांस की गर्मी से
थोडा मै पिघलाऊँ !
मन में उनके जो इच्छा है
मार -उसे थोडा मै पाऊँ !
यहाँ पे राज करेंगी मौसी
वहां पे मामा कंस !
विद्वानों को तहखाने कर
मिलकर लेंगे डँस !!
-----------------------------
भ्रमर ५
यच पी
२२.११.११ ८.१५-८.५४ पूर्वाह्न
__________________
‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले

Last edited by shuklabhramar5; December 19th, 2011 at 09:00 AM.
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  #17  
Old February 28th, 2011, 03:17 AM
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Re: “ Koyla”-maidan-e-jang me date yuva khikhiya rahe-shuklaBhramar –Hindi poem

maidan-e-jang me date yuva
फिर ..एक युवक.. मेरी जेब कट गयी
-घर जाना स़ाब- टिकटभरका ..
छूटता - झटकता - जापंहुचा -रौनक-
'बाजार' -काजू -बादाम की दुकान
-मै तोहफे में बांटनेको - चुनता -
तरहतरह के सैम्पल
फिरएक घिघियाती आवाज ..
हृष्ट -पुष्ट युवती ..गोद में झांकता
बच्चा..हेबाबू ..दे न ..कुछ..
बच्चा भूखा है कल से ..कुछ नहीं खाया..
बच्चा हँसा -शायद ये सोचकि मै 'फंसा'
मै सोचता रहा ..
कितने अच्छे लोग हैं - हमारे - 'देश' के
भरी दुकान में घुसे - 'भूखे'
मगर'लूटे' - न कुछ खाते
next in other page>>>>>>>>>>>>.
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Last edited by shuklabhramar5; April 9th, 2011 at 10:52 PM.
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  #18  
Old February 28th, 2011, 03:21 AM
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Re: “ Koyla”.MAIDAN - E-JANG ME DATE YUVA KHIKHIYA RAHE-SHUKLABhramar –Hindi poem

MAIDAN-E-JANG ME DATEY YUVA..

लौटते अपने घर - आशियाने को
गुमशुम -गुमनाम 'मै'
धुंधलके में शाम को ..
देखा कुछ तम्बू - खाली जमीन पर
कब्ज़ा -जमाये लोग- कुछ जाने -
पहचाने चेहरे ..औरतें बच्चे ..
'टेप' , 'टी.वी.' शोर -शराबा
हंसी -ठहाका ..मस्ती -मजा
'कुछ' छीलते -तलते - भूनते -
मसालों की -अजीब गंध .
shuklabhramr..see next page
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Last edited by shuklabhramar5; April 9th, 2011 at 10:53 PM. Reason: TO KEEP ALL MY POEMS (KAVITA) IN ONE THREAD-shuklabhramr
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  #19  
Old February 28th, 2011, 03:32 AM
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Re: “ Koyla” मैदान-ए -जंग में डटे - Bhramar –Hindi poem

MAIDAN-E-JANG ME DATEY YUVA KHIKHIYA RAHE...

सुबह हो गयी - दिन निकला
गोद में बन्दर से लटके
मासूम -बच्चे -नंगे चिथड़ा पहने
पान खाए महिलाएं -छोकरियाँ
हाथ में 'कटोरियाँ' -कुछ बच्चे -सम्हाले
निकलपड़े -अपनी डिउटीपर

see next page ..due to some error in website ..
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Last edited by shuklabhramar5; April 9th, 2011 at 10:53 PM.
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  #20  
Old March 5th, 2011, 07:51 AM
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Re: “ Koyla”- बकरी सा मिमियाता –“मजबूरी” दिखाता- Bhramar –Hindi poem

बकरी सा मिमियाता –“मजबूरी दिखाता-कठपुतली इस मैदान -उस मंच

'मजबूर' - लाचार
भोली आँखों वाला बूढ़ा
ताकतवर - कलाबाजीमेंमाहिर
जिसकागजब काआचार
व्यवहार !!!
बहुतदिनों सेलोगउसे
जानते -पहचानते
मानते !!
साथचलते !
आजघबराता -
चेहराछिपाता- घूमता
उसकी आँखों में
बोल में -खेल में
"रहस्य" भरा दिखता
आग से कूदने में -डरता
घबराता-दो शब्द बोलता
"बकरी सा मिमियाता"-
मजबूरी”- दिखाता
हाथ जोड़ !!

लोगों के सामने -
मंच पे यहाँ -वहां
जहाँ भी जाता
अपनी "ताकत" को भूलता
जैसे हनुमान को किसी ने
श्राप दिया हो
बस आँखें झपकाता
दिखाता मासूमियत बेबसी
"खेल" नहीं
जिसके इंतजार में
धूप में बारिश में
एक पाँवपे खडी -भूखी
उसकी प्यारीजनतादर्शक
न करिश्मा न दांव -पेंच
न जाने क्या हुआ
जरा सा इशारा -"डोर"हिली
बार -बार भागता -
अँधेरे में झांकता
परदे के पीछे बैठे -
छिपे लोगों के पास-
दौड़ जाता
दोस्ती का हाथ बढाता
पूँछ हिलाता-
"वो बन्दर"
फिर सामने आ जाता
कूदता -उछलता
दांत दिखाता -पब्लिक को
बेवकूफ बनाता-बहलाने
फुसलाने की कोशिशकरता
कुछ पचासों साल के घिसे
पिटे खेल करतब करिश्मा
दिखाता -बिना होश -बिना जोश के
और पेट पकडे -मासूम आँखे
"मज़बूरी" दिखाते
लुढ़क जाता-
लौट जाता
जनता तिलमिलाई -
गुस्साई -भांप गयी
दौड़ गयी -ले मशाल
अँधेरे में परदे के पीछे
"कौन" शक्तिशाली
बड़े लोग -उसका खेल
बिगाड़ रहे
"गुलाम" -"कठपुतली"
बना -एकडोरमें बांधे
उशको अपनेइशारे -
ऊँगली पे नचारहे-
भररहे तिजोरी
जिसकीकटोरी- में
डालते -दाना
हम
बरसोंसे खिला रहे
शुक्लाभ्रमर-५
५.३.२०११ जल पी बी
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  #21  
Old March 8th, 2011, 08:42 PM
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Thumbs up Re: “ Koyla”-पकड़ा गया लुटेरा देखो - Bhramar-Kavita –Hindi poem

पकड़ा गया लुटेरा देखो

पकड़ा गया लुटेरा देखो
भीड़ जुटी है भारी
घेर खड़े हैं -लगा तमाशा
जुटे चप्पल - नहीं तालियाँ
देते फिरते - गाली
पकड़ो - पीटो मारों इसको
भारी आज मचा है शोर
ऐसे जकड़ा मंद पड़ा है
पिजड़े में वो बंद पड़ा है
जैसे कोई "आदमखोर"
यही भीड़ जो आगे जुटती
कभी सिखाती - कभी परखती
कान पकड़ जो उठा - बैठ
कुछ उसे कराती
आग लगाने पर उसके
ना चूमा करती
क्या गोरा क्या काला
कुछ सिखलाया करती
गोदी में भर - प्यार दिए
"डोर" एक बांधे रहती
होता काहे आज 'तमाशा"
क्यों कर वो भर ले जाता-
सब घर - बीस साल से खाता
घुन सा - किया खोखला
"आप"- पोपला
पेड़ हुआ है
खड़ा अभी है
जीवनदायी
हरा - भरा है
आओ - हाथ जोड़ लें भाई
सब मिल उसमे पानी डालें
सींचे - रोज -सम्हालें
नजर रखें-
हर "घुन" - कीड़े पर
और नहीं अब खाए
"गजनी" - "गोरी" सा
भर - भर के
बाहर भी ले -जाये .
सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमर५
८.१.२०११ जल पी बी
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Last edited by shuklabhramar5; April 9th, 2011 at 10:51 PM.
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  #22  
Old March 23rd, 2011, 12:56 PM
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Thumbs up Re: “ Koyla”-ज्वालामुखी हूँ बच के रहना Bhramar –Hindi poem

ज्वालामुखी
ज्वालामुखी हूँ
बच के रहना
अभी धुआँ है
फूट पडूँगा
अंगारे तन -आग भरी है
शोले हैं -चिनगारी
कबतक -"बंकर " में
छुप रहना ???
अंधियारे में गुम-सुम गुम-सुम
परत- आज कमजोर हो रही
"कोलाहल" है
भरा हुआ -काला ये सारा
"छाती"- में !!
बना जा रहा कोयला
अंगार दहकते -
भूल जा सारी -शक्तिअपनी
नहींसख्तहै -अभी वक्त है
लावा बनकर-
बह निकलेंगे
तोड़- फाड़ के पत्थर
"पानी" बन जा -एक झील
झरने सा मिल जा -
आके इस विशाल से
"शांत" -समुन्दर
हलचल तेरी -कुछ कम होगी
"तुम " से अगर -
अथाह मै देखूं
-"शीतल" -सारे
सभी मिलेहों -
साथखड़े हों -
मुस्काते हों -
कुछ गाते हों
अपनीधुन -संगीतप्रकृति में
"लीन" -अगर हों
ठंडा -शायद मै हो जाऊं
कुछ दिन सोया पड़ा
"धरा"- में
गति -विधियों पर
नजर -गडाए
गड़ा -रहूँगा .

शुक्लाभ्रमर५
१०.३.२०११ जल पी बी
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Last edited by shuklabhramar5; April 9th, 2011 at 10:50 PM.
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  #23  
Old April 9th, 2011, 10:43 PM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

"मुठीयन भर बाल नोच मार देत पैयाँ"

टुकुर टुकुर ताकि मातु ममता की छैंया
किलकि किलकि रोय उठत देखि परछैयां
कबहुं हंसत फिर रिसात लेत ना कनैयां
चीख सुन दौड़ धाय लेत माँ बलैंया
गोद में लुकाय ढाकि आँचरा कि छैयां
गाई गान सुधा पान हरषि हरषि मैया
कोष देत सब लुटाई नाचत अंग्नैया
सो जा ललन लोरी गाई रही मैया
नटखट वो पलक मूँद -झूंठ- लरकैयां
"मुठीयन भर बाल नोच मार देत पैयाँ"
छनकत कंगना कबहु छनकी पैजनिया
मोहि लेत- बूँद छलकि जात भरी अँखियाँ
उमड़-घुमड़-प्रीति-प्यार-बादरा कि नैंया
खेल रही माँ बिभोर लरकन कि नैया
लहर -लहर -ह्रदय-सिन्धु-चूमि के कलईया
चूमि मुख गात चूमि पागल सी मैया
नजर से लुका छिपाई उर में भरत मैया
कजरा-नैनो मी झाँकि माथ टीकि पैंया
"भ्रमर' ख्वाब अंक भरे खोयी हुयी रनिया
खोलि मुख चूमि दोउ नाच -बनी-बतियाँ .

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
८.४.२०११
(लेखन २.६.१९९६ हजारीबाग झारखण्ड)
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  #24  
Old April 11th, 2011, 12:26 AM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए
आज प्रभा ने भिनसारे ही
मुस्काते अधरों से बोला


कितने प्यारे लोग धरा के
उषा काल सब जाग गए हैं
घूम रहे हैं हाथ मिलाये
दर्द व्यथा सब चले भुलाये
सूर्य-रश्मि सब साथ साथ हैं
कमल देख ये खिला हुआ है
चिड़ियाँ गाना गातीं
हवा बसंती पुरवाई सब
स्वागत में हैं आई
सूरज नाम है तांबे जैसा
जल निर्मल झरना कल-कल है
नदी चमकती जाती
सागर बांह पसारे पसरा
लहरें उछल उछल के तट पर
चरण पखारे आतीं
हे मानव तू ज्ञानी -ध्यानी
प्रेम है तुझमे कूट भरा
शक्ति तेरी अपार - है अद्भुत
हाथ जोड़ जो खड़ा हुआ
खोजे जो कल्याण भरा हो
मधुर मधुर जो कडवा न हो
कड़वाहट तो पहले से है
पानी में भी आग लगी है
तप्त ह्रदय है जलती आँखे
लाल -लाल जग जला हुआ है
खोजो बदल-बिजली खोजो
सावन घन सा बरसो आज
मन -मयूर फिर नाचे सब का
हरियाली हो धरा सुहानी
छाती फटी जो माँ धरती की
भर जाये हर घाव सभी
सूर्य चन्द्र टिमटिम तारे सब
स्वागत-मानव-तेरे आयें
निशा -चन्द्र-ला मधुर-मास सब
थकन तेरी सारी हर जाएँ
मानवता को हे मानव तू
अमर करे –
अमृत पिला -जिलाये !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१०.४.२०११ जल पी.बी.
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  #25  
Old April 11th, 2011, 03:12 PM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

[my one thread of hindi section is disappeared
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Last edited by swami; April 11th, 2011 at 03:17 PM. Reason: font reduced
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

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my one thread of hindi section is disappeared
with Title - PAGLI
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Some of your threads have been merged,maybe Pagli has also been merged.
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There are four kinds of people to avoid in the world: the assholes, the asswipes, the ass-kissers, and those that just will shit all over you.
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  #27  
Old April 11th, 2011, 03:28 PM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

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Originally Posted by swami View Post
some of your threads have been merged,maybe pagli has also been merged.
swami ji

merged with which thread i m not finding it

pls clarify

pagli having 615 views gone where ???

Bhramar5
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‘दादी’ –‘माँ’ -सपने ना मुझको
सच की तू तावीज बंधा दे
हंसती रह तू दादी अम्मा
आँचल सर पर मेरे डाले
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  #28  
Old April 11th, 2011, 03:42 PM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

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Originally Posted by shuklabhramar5 View Post
swami ji

merged with which thread i m not finding it

pls clarify

pagli having 615 views gone where ???

Bhramar5
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  #29  
Old April 11th, 2011, 03:50 PM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

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Originally Posted by shuklabhramar5 View Post
swami ji

merged with which thread i m not finding it

pls clarify

pagli having 615 views gone where ???

Bhramar5
How many views on Naari and Ghaav?
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.
March 16, 2012: Sachin Tendulkar scores his 100th century in Inter-fucking-national cricket

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  #30  
Old April 11th, 2011, 04:30 PM
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Re: “ Koyla”- Bhramar –Hindi poem

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Originally Posted by Charchila View Post
How many views on Naari and Ghaav?

jab pagli pe hi 615 ho gaye to naari pe to 1000 se upar jaane chahiye... waise clothes pe depend karta hai kya pahne hain... ghaav pe views kam aur marham jyada bante hain
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bhramar, hindi kavita, kavi, kavita, poetry


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